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Friday 04 Apr 2025 5:05 AM

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जो चाहोगे वह होगा,अगर यह कर लिया तो !


                                                              साभार चित्र स्रोत इंटरनेट 



स्वर विज्ञान इस संसार का एक बहुत ही प्राचीनतम  महत्वपूर्ण और सरल ज्योतिषीय विज्ञान है, जिसके संकेत बिल्कुल सही माने जाते हैं और इसकी मदद से हम अपने जीवन की दिशा और दशा को बदल सकते हैं। हमारे शरीर की मानसिक और शारीरिक गतिविधियाँ, दुनिया के सभी ध्वनि विज्ञान, जो आध्यात्मिक से लेकर दिव्य संपर्कों तक सब कुछ प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, दुनिया के हर व्यक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

स्वर विज्ञान की सहायता से कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में मनचाही सफलता प्राप्त कर सकता है। इसकी मदद से व्यक्ति अपने संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति और स्थिति को अपने पक्ष में कर सकता है।


हमारी नाक में दो छेद होते हैं। सामान्य स्थिति में इनमें से केवल एक छिद्र से हवा की गति जारी रहती है। कभी दाएं से तो कभी बाएं से, इसी को हम दाएं और बाएं स्वरों की गति कहते हैं। परन्तु जिस समय स्वर बदलता है उस समय दोनों छिद्रों से कुछ क्षण के लिए वायु निकलती हुई अनुभव होती है। इसके अलावा कभी-कभी सुषुम्ना नाड़ी के संचलन के दौरान हमारे दोनों नासिका छिद्रों से वायु निकलती है। बायीं ओर से श्वास लेने का अर्थ है कि हमारे शरीर की इड़ा नाड़ी में वायु का प्रवाह हो रहा है। यह स्वर ठंडा हैइसके विपरीत दाहिनी ओर से श्वास लेने का अर्थ है कि हमारे शरीर की पिंगला नाड़ी में वायु का प्रवाह हो रहा है। गर्मी हो रही है।लेकिन दोनों के मध्य में सुषुम्ना नाड़ी का ध्वनि प्रवाह है।


नाक से निकलने वाली सांस के संकेतों को समझकर हम अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में मनोवांछित परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। जिस तिथि या समय से हमें सांस लेनी चाहिए, यदि ऐसा हो जाए तो उस दिन हमें शुभ फल की प्राप्ति होगी। लेकिन अगर इसका उल्टा हुआ तो उस दिन हमें निराशा हाथ लग सकती है। इसलिए हमें किस दिन किस छिद्र में सांस लेनी चाहिए, इसका ज्ञान प्राप्त करके हम जीवन में निरन्तर प्रगति के पथ पर चल सकते हैं, जो सभी के लिए अत्यंत सरल है।


सप्ताह के तीन दिन मंगल, शनि और रवि गर्म माने जाते हैं क्योंकि इनका संबंध सूर्य स्वर से है जबकि बाकी के चार दिन चंद्र स्वर से संबंधित माने गए हैं।




सबसे पहले सुबह नींद से उठकर और सूर्योदय से पहले अपनी नासिका का स्वर देखें। यदि नियत तिथि के अनुसार आवाज चल रही हो तो बिस्तर पर भगवान से प्रार्थना करने के बाद वही पैर जमीन पर रखें। यदि तिथि के विपरीत स्वर हो तो पलंग से न उतरकर जिस तिथि में स्वर होना चाहिए, उसके विपरीत दिशा में लेटकर कुछ मिनट के लिए लेट जाएं। और जब दायां स्वर शुरू हो जाए तो उसके बाद ही पैर को पलंग के नीचे स्वर की तरफ रखें।


यानी अगर बाएं हाथ का दिन हो और चल रहा हो तो बिस्तर से उठते वक्त बाएं पैर को जमीन पर रखें, अगर दाएं हाथ का दिन हो और चल रहा हो तो शुरू करें बिस्तर से उतरते समय दाहिने पैर को जमीन पर रखकर अपनी दिनचर्या करें। .

स्वर विज्ञान के परिणाम :

सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार को बायीं नासिका से स्वर आ रहा हो तो उत्तम है। इसी प्रकार मंगलवार, शनिवार और रविवार के दिन यदि दाहिनी नासिका से स्वर बज रहा हो तो यह उत्तम कहा गया है।


अब देखते हैं कि यदि स्वर इसके विपरीत हो तो क्या होगा:-


रविवार को शरीर में दर्द रहेगा

सोमवार को कलह का वातावरण रहेगा

मृत्यु और मंगलवार को दूर देशों की यात्रा

बुधवार को राज्य से आपत्ति होगी

गुरुवार और शुक्रवार को हर काम में असफलता मिलेगी।

बल और कृषि शनिवार को नष्ट हो जाएगी

स्वरों को भी तत्वों के आधार पर बांटा गया है। प्रत्येक स्वर में एक तत्व होता है।

इसे इडा या पिंगला (बाएं या दाएं नथुने) से निकलने वाली हवा के प्रभाव से मापा जाता है।


जहां तक श्वास जाए, 16 अंगुल हो तो पृथ्वी तत्व

12 अंगुल हो तो श्वास जाती है तो जल तत्व

8 अंगुल हो तो श्वास जाती है तो अग्नि तत्व

6 अंगुल हो तो श्वास जाता है तो वायु तत्व

यदि श्वास 3 अंगुल तक जाए तो आकाश तत्व है।

यह तत्व सदैव एक सा नहीं रहता। तत्वों के परिवर्तन के साथ दिशाएँ भी बदल जाती हैं।

आगे देखेंगे तत्वों के अनुसार क्या फल निकलते हैं।


यदि शुक्ल पक्ष में नाड़ियों में तत्वों का संचार देखा जाए तो सामान्यतः बायां स्वर शुभ तथा दायां स्वर अशुभ होता है।


जब पृथ्वी तत्व चलता है तब अधिकारी/मंत्री के घर में प्रवेश होता है

अग्नि तत्व चलायमान हो तो जल भय, घाव, अग्नि भय।

यदि वायु तत्व गति करता है तो भय होता है, भागता है, गाड़ी में सवार होता है।

आकाश तत्व चलायमान हो तो मंत्र, तंत्र, यंत्र का उपदेश, ईश्वर की प्रतिष्ठा, रोग की उत्पत्ति, शरीर में निरंतर पीड़ा

यदि किसी भी समय दोनों नाड़ियाँ एक साथ चलती हैं तो यह योग में श्रेष्ठ मानी जाती है।


यात्रा के संबंध में कहा गया है कि यात्रा के दौरान इड़ा नाड़ी में चलना शुभ होता है, लेकिन जहां पहुंचकर वहां पहुंचकर घर, ऑफिस या स्थान में प्रवेश करते समय पिंगला नाड़ी चलानी चाहिए।


अगली बार जब आप घर से बाहर कदम रखें तो जांच लें कि आप कौन सा सुर बजा रहे हैं। इससे आपको अंदाजा हो जाएगा कि जिस काम के लिए आप 

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