प्रयागराज और अक्षयवट माहात्म्य :डाॅ.देव नारायण पाठक
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- Updated: 30 December, 2022 08:26
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ज्योतिष, कर्मकाण्ड, वास्तुशास्त्र संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ.देव नारायण पाठक:नेहरू ग्राम भारती मानित विश्वविद्यालय प्रयागराज
अक्षयवट पर्याय है उस कल्पवृक्ष का जिसकी छाया में अनेक ऋषियों और तपस्वियों ने कठोर तपस्या की और अपनी मनोकामनाओं को सिद्ध किया। इसी भावना से तीर्थराज प्रयाग में गंगा-यमुनाऔर सरस्वती के त्रिवेणी संगम में पूरे माघ महीने तक कल्पवास की परम्परा प्राचीनकाल से प्रचलित हुई। ब्रह्मा ,विष्णु और महेश इन तीनों का वास होने के कारण प्रयाग का माहात्म्य अत्यन्त पुण्यदायी और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है। महर्षि पाणिनि ने इसी वटवृक्ष के नीचे बैठकर भगवान शंकर की तपस्या की और उन्हीं की कृपा से चौदह माहेश्वर सूत्रों की प्राप्ति हुई। भगवान शंकर के डमरू के चौदह बार वादन करने से चौदह सूत्रों की उत्पत्ति हुई। जिसे पाणिनि सूत्र भी कहा जाता है।यही चौदह सूत्र देवनागरी लिपि में स्वर और व्यञ्जन के रूप में लिखे और पढाये जाते हैं।संस्कृत का सम्पूर्ण व्याकरण ही इन्हीं सूत्रों पर आधारित हुआ।संस्कृत संस्कार सम्पन्न भाषा इसी लिये कही जाती है।
इसी अक्षयवट और उसके प्रत्येक पत्ते पर भगवान विष्णु स्वयं वास करते हैं। इसे असिमाधव का भी क्षेत्र कहा गया है। पाताल लोक से समस्त सर्प शेषनाग के साथ यहाँ भगवान विष्णु और शिव का एक साथ दर्शन करने के लिये आये और उनका दर्शन प्राप्त करके यहीं उनकी आज्ञा से सचिव बन कर रहने लगे। पद्मपुराण में इनका उल्लेख और माहात्म्य विस्तार पूर्वक द्रष्टव्य है।
किले के भीतर मूल अक्षयवट का दर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य मुझे भी मिला है। सैनिक संरक्षण में कई अधिकारियों की अनुमति से ही उसका दर्शन सुलभ हो सका था। तने पर जलाये जाने का चिह्न भी दिखाई पड़ रहा था। किले की दक्षिणी प्राचीर से सटा हुआ वटवृक्ष का आधा हिस्सा प्राचीर के यमुना तट की ओर भी लटकता हुआ दृष्टिगत होता है। इसका पौराणिक व आध्यात्मिक माहात्म्य रामायण ,महाभारत व अनेक पुराणों में भी द्रष्टव्य है।पद्मपुराण में प्रयागमाहात्म्य शताध्यायी के अन्तर्गत इसका विशेष वर्णन मिलता है।
प्रयाग के माधव -
पद्मपुराण में प्रयागमाहात्म्य शताध्यायी के अन्तर्गत भगवान् विष्णु स्वयं ब्रह्मा के पुत्रों से भूलोक के सर्वाधिक प्रभावशाली स्थलों के बारे में पूँछे जाने पर अक्षयवट के माहात्म्य के बारे में जिज्ञासा किये जाने पर स्वयं उनसे कहते हैं कि प्रयागक्षेत्र में जो वटवृक्ष है वह मेरे लिये वैकुण्ठ से भी बढ़कर है।मूल में जो पुरुष है वह मैं अक्षय माधव हूँ।उस पुरुष को वट माधव और मूलमाधव भी कहते हैं।इस प्रकार इन नामों से युक्त होकर मैं वहाँ रहता हूँ। तीर्थराज में वहाँ ब्रह्मा आदि देवता भी रहते हैं। समस्त विघ्नों को दूर करने के लिये और भक्तों की कार्य सिद्धि के लिये दिशा विदिशाओं में अन्य रूपों में आठ नाम धारण करके मैंं वहाँ रहता हूँ। मेरे वे आठ नाम हैं-
शंखमाधव,चक्रमाधव,गदामाधव,पद्ममाधव,अनन्तमाधव,बिन्दुमाधव,मनोहरमाधव और असिमाधव।
प्रयागं वैष्णवं क्षेत्रं वैकुण्ठादधिकं मम।
वृक्षोऽक्षय्यवटस्तत्र मदाधारो विराजते।।
मूले य: पुरुष: दृष्ट: सोऽहमक्षय्य-माधव ।
वटमाधवनामापि मूलमाधव इत्यपि।।
एवं त्रिनामा तत्राहं वसाम्यक्षय्यपादपे।
ब्रह्मादिभि: सुरै: सर्वै: सहितस्तीर्थनायके।।वटवृक्ष
मूलमाधव- इन माधवों का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वट के दाहिने भाग में देवता और ऋषियों से सेवित मनुष्यों को सर्वसिद्धि देनेवाला उत्तम वैष्णव पीठ है।वहाँ मूलमाधव नामक माधव रहते हैं । वट के उत्तर की ओर अक्षय माधव का निवास है और वट के नीचे वटमाधव हैं।माधव की कृपा से इस वट का और पीठ का प्रलय में भी नाश नहीं होता। शाक्त ,सौर,गाणपत्य,शैव आदि अन्य सभी पीठ इस पीठ पर निवास करते हैं। शूलटंकेश्वर उन माधवों का प्रतिदिन पूजन करते हैं और धूर्जटी भक्तिपूर्वक वेदसूक्तों से प्रार्थना करते हैं।
वाल्मीकि रामायण में वनगमन करते हुए भगवान श्रीराम सीता और लक्ष्मण के साथ जब प्रयाग की भूमि पर महर्षि भरद्वाज के आश्रम में पदार्पण करते हैं तो वहाँ उनका पुत्रवत् आतिथ्य सत्कार करके मङ्गल सूचक स्वस्तिवाचन करके उन्हें गंगा जी के जल के वेग से प्रतिकूल दिशा में मुड़ी हुई यमुना के पास पहुँच कर लोगों के आने जाने के कारण उनके पदचिह्नों से चिह्नित हुए अवतरण प्रदेश को विधिवत् देखभाल कर वहाँ जाने और एक बेड़ा बनाकर उसी के द्वारा सूर्यकन्या यमुना के उस पार उतर जाने का सदुपदेश करते हैं और फिर एक बहुत बड़े न्यग्रोध (बरगद) वृक्ष का परिचय कराते हैं। उस वटवृक्ष के पत्ते हरे रंग के पत्ते हैं ,वह चारों ओर से बहुसंख्यक अन्य वृक्षों से घिरा हुआ है। उस वृक्ष का नाम श्यामवट है।उसकी छाया के नीचे बहुत से सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। वहाँ पहुँंच कर सीता दोनों हाँथ जोड़कर उस वृक्ष से आशीर्वाद की याचना करें।यात्री की इच्छा हो तो उस वृक्षके पास जाकर कुछ कालतक वहाँ निवास करें अथवा वहाँ से आगे बढ़ जाय।
गंगा यमुनयो: संधिमासाद्य मनुजर्षभौ।
कालिन्दीमनुगच्छेतां नदीं पश्चान्मुखाश्रितम्।।
अथासाद्य तु कालिन्दीं प्रतिस्रोत: समागताम्।
तस्यास्तीर्थे प्रचरितं प्रकामं प्रेक्ष्य राघव ।
तत: यूयं प्लवं कृत्वा तरतांशुमतीं नदीम्।।
ततो न्यग्रोधमासाद्य महान्तं हरितच्छदम्।
परीतं बहुभिर्वृक्षै: श्यामं सिद्धोपसेवितम्।।
तस्मिन् सीताञ्जलिं कृत्वा प्रयुञ्जीताशिषां क्रियाम्।
समासाद्य च तं वृक्षं वसेद् वातिक्रमेत वा।।
वा.रा.अयो.का. अध्याय 55/4-7
इसप्रकार भरद्वाज मुनेि से बताये गये मार्ग के अनुसार वे तीनों लोग यमुना तट पर पहुँचे और यमुना पार करने के लिये इधर उधर से सुखी लकड़ी और बांस का बेड़ा बनाकर सीता सहित उस पार गये। सीता यमुना जी से सकुशल पार होने और वनवास अवधि को पूर्ण कर पुन: आने और सहस्रों गायों आदि का दान करने का संकल्प करती हुई यमुना को तीनों लोग पार कर गये। तत्पश्चात् यमुनापार करके वे उस हरे-भरे पत्तों से सुशोभित शीतल छायावाले न्यग्रोध श्यामवट के पास जा पहुँचे। वट के समीप पहुँच कर विदेहनन्दिनी सीता ने उसे मस्तक झुकाया और इस प्रकार प्रार्थना की - महावृक्ष आपको नमस्कार है। आप ऐसी कृपा करें,जिससे मेरे पतिदेव अपने वनवास विषयक व्रत को पूर्ण कर सकें तथा हम लोग वन से सकुशल लौटकर माता कौशल्या तथा यशस्विनी सुमित्रा देवी का दर्शन कर सकें। इस प्रकार मनस्विनी सीता ने हाँथ जोड़े हुए उस वृक्ष की परिक्रमा की।सदा अपनी आज्ञा के अधीन रहने वाली प्राणप्यारी सती साध्वी सीता श्यामवट से आशीर्वाद की याचना करती हुई अग्रसर हुई।
ते तीर्णा: प्लवमुत्सृज्य प्रस्थाय यमुनावनात्।
श्यामं न्यग्रोधमासेदु: शीतलं हरितच्छदम्।।
न्यग्रोधं समुपागम्य वैदेही चाभ्यवन्दत।
नमस्तेऽस्तु महावृक्ष पारयेन्मे पतिर्व्रतम्।।
कौसल्यां चैव पश्येम सुमित्रां च यशस्विनीम्।
इति सीताञ्जलिं कृत्वा पर्यगच्छन्मनस्विनी।। वा.रा.अयो.का. अध्याय 55/ 23-25
पद्मपुराण में अक्षयवट को श्यामवट भी कहा गया है-
श्यामोवटऽश्यामगुणं वृणोति ,स्वच्छायया श्यामलया जनानाम्।
श्याम: श्रमं कृतन्ति यत्र दृष्टि: स तीर्थराजो जयति प्रयाग: ।।
पद्मपुराण ,उत्तरखण्ड 23/29
महाकवि कालिदास ने भी रघुवंश महाकाव्य में श्यामवट का वर्णन किया है-वनवास से लौटते समय श्रीराम सीता से श्यामवट को प्रणाम करने को कहते हैं -
त्वया पुरस्तादुपयाचितो य: सोऽयं वट: श्याम इति प्रतीत: ।
राशिर्मणीनामिव गारुडानां सपद्मराग: फलितो विभाति।। रघुवंश ,13/53
प्रयाग को अक्षयक्षेत्र कहा गया है।वहाँ अक्षय वट है । इसका तात्पर्य है कि ऐसे वृक्ष का कभी नाश नहीं होता। कहा जाता है कि इस अक्षय वट का नामकरण व्यास जी ने किया था। वह अक्षयवट प्रलयकाल में भी विद्यमान रहता है । उस समय उसके प्रत्येक पत्ते पर भगवान विष्णु शयन करते हैं।
प्रयागमक्षयं क्षेत्रमक्षय्या तत्र भूमिका।
अक्षयो हि वटो यत्र किं न तत्राक्षयं भवेत्।।
स चाक्षयवटो ख्यात: कल्पान्तेऽपि च दृश्यते।
शेते विष्णुर्यस्य पत्रे अतोऽयमव्यय: स्मृत: ।। पद्मपुराण ,उत्तरखण्ड 24/8
यत्र चैकार्णवे शेते नष्टे स्थावर जङ्गमे ।
सर्वत्र जल-सम्पूर्णे वटे बाल वपुर्हरि: ।।
मत्स्यपुराण के अनुसार भगवान शिव ने स्वयं को प्रयाग में पवित्र अक्षय वट के रूप में
स्थापित कर लिया था। शूलपाणि महेश्वर स्वयं इसकी रक्षा करते हैं।
"तं वटं रक्षति सदा शूलपाणिमहेश्वर: "
अक्षयवट,जहाँ क्षेत्र का शिरोमणि होकर विराजमान रहता है ,शिवजी के तांडव से प्रसन्न होकर माधव का वहाँ मंगलमय वास है। परम वैष्णवी योगी शिव भी,,जो सज्जनों के कल्याण करने वाले हैं ,माधव की प्रसन्नता के लिये वटवृक्ष के समीप बड़े वेग से नृत्य करते हैं और सुन्दर तांडव से माधव को प्रसन्न करते हैं-
परमो वैष्णवो योगी ,शिवोऽपि शिवकृतसताम्।
वटमूलं समासाद्य माधवानुग्रहेच्छया।।
यहाँ अक्षय वट की छाया हरित मणि के समान शोभित होती है ,जिसे देखकर देवता भी प्रसन्न होते हैं।यह जहाँ फैलती है , उसे ' विकिर क्षेत्र ' कहते हैं। इसका नाम लेने से ही पाप नष्ट हो जाते हैं ।दर्शन, स्नान ,पान और वास करने से फल मिलता है -
तत्क्षेत्रं विकिर नाम कीर्तनादघनाशनम्।
किं पुनर्दर्शनस्नान-पान-वासै: फलप्रदम्।।
इसी वट वृक्ष के समीप ही देवता ,ऋषि आदि पधारते हैं और ब्रह्मा ने यहीं दस यज्ञ किये थे-
वटमूलेति विख्यातं सर्वदेवर्षिसम्मतम्।
यत्रेष्टं ब्रह्मदेवेन क्रतूनां दशकेन च।।
अग्निपुराण में यह भी वर्णन मिलता है कि जो व्यक्ति इस वट वृक्ष-स्थल पर अपने प्राण त्यागता है ,वह विष्णुलोक को प्राप्त करता है-
प्रयागवटशाखाग्रात् पतनं य: करोति स: ।
स्वयं देहनिवासस्य काले प्राप्ते महीपति: ।
उत्तमान् प्राप्नुयां लोकान् नात्मघाती भवेत्क्वचित्।।
कूर्मपुराण में भी इस वृक्ष के नीचे प्राण त्यागने से रुद्रलोक प्राप्त होने का वर्णन है-
वटमूलं समासाद्य यस्तु प्राणान् विमुञ्चति।
स्वर्गलोकानतिक्रम्य रुद्रलोकं स गच्छति।।
इसी लिये प्रयाग माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि प्रयाग जैसा कोई दूसरा तीर्थ नहीं है, और अक्षयवट जैसा कोई अन्य वृक्ष नहीं है।तीनों लोकों में त्रिवेणी जैसा अन्य कोई क्षेत्र भी नहीं है।
प्रयागं सदृशं तीर्थमक्षयवटसमो वट: ।
त्रिवेणी सदृशं क्षेत्रं त्रैलोक्ये नास्ति किञ्चित्।।
वटवृक्ष का माहात्म्य बतलाते हुए पद्मपुराण में यह भी कहा गया है कि ब्रह्माण्ड में ऐसा दूसरा वृक्ष नहीं है इसी लिये देवता भी इनकी पूजा करते हैं-
तस्मादेवं विधो वृक्षो नास्ति ब्रह्माण्डगोलके ।
अतोऽर्चन्त्यमुं देवा मनुष्याणां का कथा।।
तीनों लोकों को एकत्र करके आदि पुरुष यहाँ शयन करते हैं ,पैर का अँगूठा हाँथ से पकड़ कर मुँह में पीते हैं-
संशेते वै पुमानाद्य: संहृत्य भुवनत्रयम्।
पादागुष्ठं करे धृत्वा पिबत्रास्त्यत्र बालक: ।।
करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्देन विनिवेशयन्तम्।
वटस्य पत्रस्य पुरे शयानं बालं मुकुन्दं शिरसा नमामि।।
त्रिशूल के अग्रभाग में काशी को उठाकर विश्वनाथ प्रसन्न होकर प्रलय काल में,जिसके मूल में निवास करते हैं ,उस समय सबके सामने खड़े होकर ' वट ' की प्रार्थना करते हैं,पूजा करते हैं और नमस्कार करते हैं ।
विश्वेश्वरस्त्रिशूलाग्रे काशीमारोप्यसत्वरम्।
तिष्ठतिप्रलये यस्य मूले नृत्यन् प्रहर्षित: ।।
तस्मिन् काले वटे सर्वे प्रार्थयन्तीमक्षयम्।
पूजयन्ति नमस्यन्ति गृणन्ति च पुर:स्थिता।।
गोस्वामी तुलसी दास भी श्री राम चरितमानस में प्रयाग वर्णन करते हुए माघ मास में तीर्थराज प्रयाग में देव ,दनुज,नर, किंनर आदि लोगों के पधारने और स्नान करने का वर्णन करते हैं । वहीं माधव के पूजन और अखयवट के दर्शन से हर्षानुभूति का भी वर्णन करते हैं-
माघ मकरगत रबि जब होई, तीरथपतिहिं आव सब कोई।
देव दनुज किंनर नर श्रेनीं ,सादर मज्जहिं सकल त्रिवेनीं।
पूजहिं माधव पद जलजाता,परसि अखय बटु हरषहिं गाता।।
इस प्रकार अक्षयवट को प्रणाम करने से सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं और ध्यान करने से सभी का ध्यान हो जाता है।श्वेत और श्याम वर्ण वाली गंगा और यमुना जिसके चामर हैं, अक्षयवट साक्षात् नीला आतपत्र है ऐसा वह प्रयाग तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ तीर्थराज प्रयाग है।
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