क्यों मचा है बवाल? ओबीसी सर्टिफिकेट पर कोर्ट की फटकार के बाद बंगाल में !
कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल में कई वर्गों का ओबीसी दर्जा रद्द कर दिया है। 2010 से अब तक 77 समुदायों को ओबीसी सर्टिफिकेट बांटे गए थे। हाईकोर्ट ने इन्हें रद्द कर दिया। इनमें से ज्यादातर मुस्लिम समुदाय से जुड़े थे। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया है कि जिन वर्गों का ओबीसी दर्जा खत्म किया गया है, अगर उनके सदस्य पहले से ही सेवा में हैं या आरक्षण का लाभ ले चुके हैं तो इस फैसले का उनकी सेवाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
दरअसल, इस चुनावी माहौल में यह बड़ा मुद्दा बन गया है, जब छठे चरण के चुनाव में सिर्फ 2 दिन बचे हैं। ऐसे में इसका सीधा असर लोकसभा सीटों पर पड़ सकता है। चूंकि, बीजेपी ने इसे ममता सरकार की तुष्टिकरण की राजनीति करार दिया है। ममता सरकार ने ओबीसी वर्गों को दो वर्गों ओबीसी ए और ओबीसी बी में बांट दिया था। जिसमें ओबीसी ए का मतलब है अति पिछड़ा। जबकि, ओबीसी बी का मतलब है सिर्फ पिछड़ा।
बंगाल सरकार ने ज्यादातर मुस्लिम जातियों को ओबीसी सूची में शामिल किया है। साथ ही ममता सरकार ने पिछले 10 सालों में जिन समुदायों को इसमें शामिल किया है, उनमें सबसे ज्यादा महत्व मुसलमानों को दिया गया है. हालांकि उन पर रोहिंग्या और बांग्लादेश से आए लोगों को भी इस लिस्ट में शामिल करने का आरोप है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या ओबीसी लिस्ट को लेकर कोर्ट के फैसले से ममता बनर्जी के वोटों पर असर पड़ेगा? पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण का इतिहास क्या है? साल 2010 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की सरकार सत्ता में थी. उस दौरान वाम मोर्चे ने 53 जातियों को ओबीसी कैटेगरी में रखा था. उस दौरान वाम मोर्चा सरकार ओबीसी का आरक्षण 7 से बढ़ाकर 17 फीसदी करना चाहती थी. जबकि साल 2011 में जब वाम सरकार सत्ता से बाहर थी तो ये कानून नहीं बन पाया था. इसके बाद 2012 में बंगाल में ममता दीदी की सरकार सत्ता में आई. जो ओबीसी वर्ग को आरक्षण देती है. ममता सरकार ने इस आरक्षण में 35 नई जातियों को जोड़ा. जिसमें 33 मुस्लिम समुदायों का ओबीसी आरक्षण 7 फीसदी से बढ़ाकर 17 फीसदी कर दिया गया. हालांकि इस कानून के बनने से राज्य की 92 फीसदी मुस्लिम आबादी को आरक्षण का लाभ मिला. बंगाल में ओबीसी आरक्षण का क्या है गणित? पश्चिम बंगाल सरकार ओबीसी वर्ग को 17 फीसदी आरक्षण देती है. जहां इसे दो हिस्सों में बांटा गया है. जिसमें ओबीसी ए और ओबीसी बी. जबकि, ओबीसी ए की श्रेणी में 81 जातियां हैं, जिनमें से 56 मुस्लिम हैं. वहीं, ओबीसी बी की श्रेणी में 99 जातियां हैं, जिनमें से 41 जातियां मुस्लिम हैं. अब कोर्ट ने कहा है कि सरकार ने 77 जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल कर मुसलमानों का अपमान किया है. 77 समुदायों में से 42 को 2010 में तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने ओबीसी का दर्जा दिया था. कोर्ट ने कहा, इनमें से 41 मुस्लिम थे. फैसले के अनुसार, अन्य 35, जिनमें से 34 मुस्लिम थे, को ममता सरकार ने 11 मई 2012 को अधिसूचना जारी करके ओबीसी सूची में शामिल किया था। हाईकोर्ट ने 2012 के कानून को रद्द कर दिया। इस कानून की वजह से पश्चिम बंगाल में सरकारी नौकरियों में ओबीसी उम्मीदवारों को आरक्षण मिलना शुरू हुआ। इसके कुछ प्रावधानों को कोर्ट में चुनौती दी गई। मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने 2012 के उस कानून के प्रावधान को रद्द कर दिया। अब उन पर आरोप है कि पश्चिम बंगाल में पिछला आयोग अधिनियम 1993 लागू है। टीएमसी ने उससे हटकर सूची जारी की। जो पूरी तरह से अवैध है। पश्चिम बंगाल का जातिगत समीकरण जानिए? आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल में सवर्ण 20 प्रतिशत हैं, जबकि ओबीसी 24 प्रतिशत और एससी 20 प्रतिशत और एसटी 6 प्रतिशत हैं। इसके साथ ही मुस्लिम 27 प्रतिशत और अन्य जातियां 3 प्रतिशत हैं, जिसमें से मुस्लिम समुदाय की 27 प्रतिशत आबादी में से 85 प्रतिशत को ओबीसी श्रेणी में शामिल किया गया है।
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