चांद पर सफलतापूर्वक लैंडिंग कर भारत ने विश्व में रचा इतिहास, प्रयागराज के इन दो युवाओं के दिमाग ने दिखाया कमाल!
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- उत्तर प्रदेश
- Updated: 24 August, 2023 13:18
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प्रयागराज के इन दो युवाओं का दिमाग चला चांद पर
प्रयागराज: (Chandrayaan 3 successful लैंडिंग) चंद्रयान-3 ने चंद्रमा की धरती पर कदम रखकर एक नया रिकॉर्ड बनाया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि चंद्रयान 2 की विफलता से सबक लेते हुए चंद्रयान 3 ने लैंडर और रोवर में बदलाव किए जाने के बाद लैंडर की सतह पर अपना मिशन सुरक्षित रूप से पूरा किया।
इसरो के इस मिशन में प्रयागराज के कई लोग अहम जिम्मेदारी निभा रहे हैं. इसमें जेके इंस्टीट्यूट, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हरिशंकर गुप्ता और एमएनएनआईटी की पूर्व छात्रा नेहा अग्रवाल भी शामिल हैं।
प्रयागराज के पूर्व छात्रों ने अहम भूमिका निभाई।
चंद्रयान-3 के चंद्रमा की सतह पर उतरने में विफल रहने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र इसरो वैज्ञानिक हरिशंकर गुप्ता ने चंद्रयान-3 की सुरक्षित लैंडिंग के लिए खतरे का पता लगाने वाली प्रणाली विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस सिस्टम के इस्तेमाल से चंद्रमा की सतह पर उतरते समय लैंडर खुद ही क्रेटर या गड्ढे का खतरा भांप लेगा और सुरक्षित सतह ढूंढकर खुद ही लैंड कर लेगा।
चंद्रयान वन, टू और थ्री प्रोजेक्ट में शामिल इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद में कार्यरत हरिशंकर गुप्ता की टीम ने सुरक्षित लैंडिंग के लिए एक नया सेंसर-आधारित सिस्टम विकसित किया था। वहीं, सिविल लाइंस की नेहा अग्रवाल भी चंद्रयान मिशन में शामिल हैं।
वह मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी) से इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार में बीटेक पूरा करने के बाद 2017 में चंद्रयान परियोजनाओं में शामिल हुईं।
लैंडर चांद पर उतरेगा
एमएनएनआईटी के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन प्रो. राजीव त्रिपाठी का कहना है कि चंद्रयान-3 में कई बदलाव किए गए हैं। अभी तक यह बेहद धीमी गति से चंद्रमा की सतह की ओर बढ़ रहा है। इसरो के इस मिशन में एमएनएनआईटी के कई पूर्व छात्र भी शामिल हैं. चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहले सफल मिशन के लिए भारत को मान्यता मिलने की उम्मीद है।
सॉफ्ट लैंडिंग का लोहा पूरी दुनिया मानेगी
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) सेल के प्रमुख प्रो. आशीष खरे का कहना है कि उनके द्वारा पढ़ाए गए छात्र मिशन की सफलता को लेकर आश्वस्त हैं। चंद्रयान को चंद्रमा की ओर तेजी से ले जाने की बजाय उसे सुरक्षित लैंडिंग कराने को प्राथमिकता दी गई।
पश्चिमी देशों की तुलना में सॉफ्ट लैंडिंग पर काम किया गया. चंद्रयान ने एक सप्ताह में चंद्रमा पर 250 किमी की दूरी तय की और अगले 40 किमी की दूरी तय करने में उसे दो दिन लगे। इस मिशन की सफलता से सॉफ्ट लैंडिंग की प्रक्रिया सभी देश अपनाएं
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