आजकल झूठ बोलने की प्रथा बढ़ी:इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रेप के आरोपी को झूठा फंसाए जाने पर की टिप्पणी, रिहा करने का दिया आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आजकल समाज में झूठ बोलने की प्रथा उच्चस्तर पर बढ़ गई है। रेप का आरोप लगाने से समाज में याची की छवि धूमिल हुई है। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और रेप में शामिल होने के कारण उन्हें बदनामी का सामना करना पड़ा। उन्होंने समाज में सम्मान खो दिया, जबकि समाज में सभी को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। आरोपी को इस आधार पर बरी कर दिया जाता है कि पीड़िता से दुश्मनी हो गई है। उसके खिलाफ कलंक कुछ हद तक धुल सकता है, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। यह अच्छी तरह से तय है कि बेगुनाही की धारणा को पीड़ित के अधिकार के साथ संतुलित करना होगा। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह ने हरिओम शर्मा की जमानत अर्जी मंजूर करते हुए की है।
बुलंदशहर में दर्ज कराई थी रिपोर्ट
मामले में याची के खिलाफ बुलंदशहर के अनूपशहर थाने में केस दर्ज कराई गई थी। कोर्ट ने कहा कि आरोपी, पीड़िता या किसी गवाह को झूठ बोलकर आपराधिक मुकदमे को पलटने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। एक आपराधिक मुकदमे में न्याय मिलना एक गंभीर मुद्दा है। इसे केवल अभियोजन पक्ष के मुख्य गवाहों, पीड़ितों को बरी करने के आधार पर मुकर जाने की अनुमति देकर मजाक नहीं बनाया जा सकता। शिकायत करने वाले को भी जवाबदेह होना चाहिए और जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेनी चाहिए।
पीड़िता को दिए गए मुआवजे को वापस करने का आदेश
कोर्ट ने कहा कि सामाजिक हितों को ध्यान में रखते हुए निचली अदालत के लिए उपयुक्त मामलों में सीआरपीसी की धारा 344 का सहारा लेना चाहिए। मौजूदा मामले में क्योंकि, ट्रायल कोर्ट के सामने अभियोजन पक्ष मुकर गया है और अभियोजन पक्ष के तथ्य को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। इसलिए वह सरकार द्वारा भुगतान किए गए किसी भी मुआवजे के लाभ की हकदार नहीं है। इसे देश के करदाताओं से एकत्र किया गया है। पीड़िता को यदि कोई मुआवजा दिया गया है तो उसे कोषागार में जमा कराया जाए।
मामले में याची के खिलाफ बुलंदशहर के अनूपशहर थाने में रेप के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया गया था। इसके साथ ही दो और लोगों को सहअभियुक्त बनाया गया था। दोनों सहअभियुक्तों की जमानत हाईकोर्ट से पहले ही मंजूर हो चुकी है। कोर्ट ने तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए याची की जमानत अर्जी को मंजूर कर लिया!
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